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माँ ❤️❤️Maa❤️❤️ जिसके आँचल में सिमट जाती है सारी कायनात…​ममता की छाँव

माँ …..

इस अनंत ब्रह्मांड में यदि कोई ऐसी शक्ति है जो ईश्वर के सबसे करीब है, तो वह ‘माँ’ है। माँ केवल एक रिश्ता या शब्द नहीं है, बल्कि यह वह भावना है जिसमें सुरक्षा, वात्सल्य, त्याग और करुणा की पराकाष्ठा समाहित है। जब कोई शिशु इस संसार में कदम रखता है, तो वह पूरी तरह से अनजान और असहाय होता है। उस समय माँ ही उसका पूरा संसार बनती है। माँ शब्द की ध्वनि में ही एक ऐसा सुकूँ और जादू है, जो इंसान के हर दुःख-दर्द को पल भर में दूर कर देता है। सच ही कहा गया है कि ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं रह सकता था, इसलिए उसने धरती पर माँ को भेजा। माँ की ममता एक अनूठा और निस्वार्थ का अहसास है। संसार के हर रिश्ते में कहीं न कहीं स्वार्थ या लेन-देन की भावना छिपी हो सकती है, लेकिन एक माँ का प्रेम इन सब सांसारिक बंधनों से परे और पूरी तरह से निस्वार्थ होता है।

​एक स्त्री जब माँ बनती है, तो वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, सपनों और कभी-कभी अपने करियर तक का हंसते-हंसते त्याग कर देती है। माँ वह दीपक है जो खुद को जलाकर पूरे घर को रोशन करता है, लेकिन कभी अपनी रोशनी का हिसाब नहीं मांगता। माँ का अपने बच्चों से रिश्ता जन्म से नहीं, बल्कि गर्भ से ही जुड़ जाता है। नौ महीने तक वह जिस कठिन शारीरिक और मानसिक दौर से गुजरती है, वह किसी कठोर तपस्या से कम नहीं है। हर पल की तकलीफ, करवट बदलने की असुविधा और प्रसव की असहनीय पीड़ा को वह सिर्फ इसलिए सहती है क्योंकि उसे अपने आने वाले बच्चे से असीम प्रेम होता है। बच्चे के जन्म के बाद माँ का जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। अब उसकी खुद की कोई प्राथमिकता नहीं होती। यदि बच्चा भूखा है, तो माँ को भूख नहीं लगती, यदि बच्चा बीमार है, तो माँ की रातों की नींद उड़ जाती है। वह अपने बच्चे की मुस्कान में ही अपनी पूरी कायनात देख लेती है।

​हम अक्सर देखते हैं कि माँ घर के कामों में इस कदर व्यस्त रहती है कि उसे खुद के लिए दो पल का वक्त भी नहीं मिलता। वह सुबह सबसे पहले उठती है ताकि बच्चों को समय पर नाश्ता और स्कूल के लिए तैयार कर सके, और रात को सबके सोने के बाद ही सोती है। वह फटे कपड़ों में रह लेगी, लेकिन अपने बच्चों के लिए हमेशा नए और बेहतरीन कपड़ों का इंतजाम करेगी। रसोई में बची हुई थोड़ी सी सब्जी या रोटी को वह खुद खा लेगी, ताकि उसके बच्चे पेट भरकर खा सकें। इस प्रकार का सर्वोच्च त्याग केवल एक माँ ही कर सकती है। शिक्षा की शुरुआत किसी स्कूल या कॉलेज से नहीं, बल्कि माँ की गोद से होती है। माँ बच्चे की पहली शिक्षिका होती है जो उसे न केवल बोलना और चलना सिखाती है, बल्कि जीवन के नैतिक मूल्यों से भी परिचित कराती है।

​माँ हमें सिखाती है कि बड़ों का सम्मान कैसे करना है, छोटों से प्यार कैसे करना है और विपरीत परिस्थितियों में भी ईमानदारी के रास्ते पर कैसे चलना है। वह अपनी कहानियों और लोरियों के माध्यम से हमारे भीतर साहस, दया और सहानुभूति जैसे गुणों का बीजारोपण करती है। जब पूरी दुनिया हमारे टैलेंट या क्षमताओं पर शक करती है, तब भी माँ की आँखों में हमारे लिए एक अटूट विश्वास होता है। वह हमारी असफलताओं पर हमें डांटने के बजाय गले से लगाती है और कहती है कि कोई बात नहीं, अगली बार तुम जरूर सफल होगे। माँ का यह छोटा सा वाक्य किसी भी इंसान के भीतर सोए हुए आत्मविश्वास को जगाने के लिए काफी होता है।

​किसी भी परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखने का काम माँ ही करती है। वह परिवार के हर सदस्य जैसे पति, बच्चे, और सास-ससुर की पसंद-नापसंद, उनके मूड और उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखती है। घर में जब भी कोई संकट या आर्थिक परेशानी आती है, तो माँ अपनी सूझबूझ से हर मुश्किल को आसान बना देती है। वह बिना किसी वेतन, बिना किसी साप्ताहिक छुट्टी और बिना किसी शिकायत के साल के ३६५ दिन काम करती है। वह एक कुशल मैनेजर, एक बेहतरीन रसोइया, एक डॉक्टर और एक सच्ची सहेली की भूमिका एक साथ निभाती है। माँ का हृदय करुणा की वह अनंत सरिता है जो परिवार के हर सदस्य के अवगुणों को भुलाकर केवल स्नेह बरसाती है।

​आज का समाज तेजी से बदल रहा है। हम आधुनिकता की दौड़ में इतने अंधे हो चुके हैं कि अक्सर उस माँ को पीछे छोड़ देते हैं जिसने हमें चलना सिखाया था। युवा पीढ़ी अपनी पढ़ाई, नौकरी, करियर और सोशल लाइफ में इतनी व्यस्त हो जाती है कि उनके पास माँ के पास बैठकर दो पल बात करने का समय भी नहीं होता। यह बेहद दुखद है कि जिस माँ ने हमारे बचपन को संवारने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, बुढ़ापे में उसे अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। वृद्ध आश्रमों की बढ़ती संख्या हमारे समाज के गिरते नैतिक स्तर का जीता-जागता प्रमाण है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि माँ को हमारे पैसों या महंगे उपहारों की जरूरत नहीं होती, उसे सिर्फ हमारे थोड़े से समय, सम्मान और प्यार की भूख होती है।

​यदि हम वास्तव में अपनी माँ से प्रेम करते हैं, तो हमें अपने जीवन में कुछ बातों को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। पहली बात है समय देना। दिनभर की भागदौड़ में से कम से कम १५-२० मिनट माँ के पास बैठकर उनकी बातें जरूर सुनें। इससे उनका अकेलापन दूर होगा और उन्हें लगेगा कि वे आज भी हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी पहले थीं। दूसरी बात है सम्मान देना। कभी भी उनके सीधेपन, उनके पुराने ख्यालात या उनके कम पढ़े-लिखे होने का मजाक न उड़ाएं और न ही किसी के सामने उन्हें कमतर आंकें। इससे उनका आत्मसम्मान बना रहता है। तीसरी बात है उनके स्वास्थ्य की देखभाल करना। बुढ़ापे में उनके खान-पान और दवाइयों का विशेष ध्यान रखें। यह उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत और मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस कराएगा।

​जिस घर में माँ नहीं होती, वह घर केवल ईंट-पत्थरों का एक निर्जीव ढांचा मात्र रह जाता है। माँ की अनुपस्थिति में घर की रौनक, खुशियाँ और बरकत जैसे कहीं दूर खो जाती हैं। दुनिया की कोई भी दौलत, कोई भी ऐश-ओ-आराम माँ के आँचल की छाँव की बराबरी कभी नहीं कर सकता। माँ के जाने के बाद इंसान को गहराई से अहसास होता है कि उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा और अनमोल खजाना खो दिया है। इसलिए जब तक माँ हमारे साथ है, हमें उनके हर पल को खुशियों से भर देना चाहिए और उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए।

​माँ इस धरती पर साक्षात ईश्वर का रूप है। माँ की महिमा इतनी अनंत है कि यदि समुद्र की स्याही बना ली जाए और धरती के सारे पेड़ों की कलमें, तब भी माँ के उपकारों और उनके महत्व को पूरी तरह से पन्नों पर लिखा नहीं जा सकता। वह हमारी हर सांस में, हमारे हर संस्कार में और हमारी हर छोटी-बड़ी सफलता में समाहित है। हमारा यह अस्तित्व, यह सुंदर जीवन सब उसी की अनमोल देन है। इसलिए हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम अपनी माँ को दुनिया की हर खुशी दें, उनका हमेशा आदर करें और कभी भी उनकी आँखों में अपनी किसी गलती या व्यवहार की वजह से आँसू न आने दें। माँ की सच्ची सेवा ही इस संसार का सबसे बड़ा धर्म, सबसे बड़ा कर्म और सबसे बड़ी पूजा है।

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